भुला शहर

​ना जाने क्या था उसकी हवा में

शायद गंगा की खुशबू थी

जो साथ यहाँ तक चाली आई

आँखों से ओझल हो गए सपने

पर वो यादें कभी न मिटा पायी

बहुत पुराना रिश्ता है मेरा

ये शहर, ये गली और ये नदियों से

वो नाँव और धुन्दला सा सूरज

वक़्त भी रुक जाता था गंगा को देखते

खो गया है वक़्त अब

गुलमोहर के फूल और नीम की टहनी

अपनापन बताते थे

और गर्मी में लू बहुत सताते थे

फूल सूख गए आँख भीग गई

शहर बदल गया पर याद न बदली

हमे तो लगता है,

मोहब्बत हो गई है उसे शायद

जो बार बार सपने में आता है

बिना कहे कुछ बिना सुने कुछ

सिर्फ बीती पल याद दिलाता है

शायद कहता वापस आ जाओ

मैं वहीँ हवा चलाता हूँ

वो लोग न मिले तुम्हे शायद

पर एहसास वही दिलाऊंगा